Friday, 1 July 2011

समाज की कलंक बन गई हूँ, जब डायन की उपाधि मिली’’




मैं सावित्री देवी, उम्र-50 वर्ष है। मेरे पति का नाम स्व0 द्वारिका दास है। मैं ग्राम-नावाडीह, पोस्ट-डोमचाॅच, थाना-डोमचाॅच, जिला-कोडरमा की मूल निवासी हूँ।

मेरी घटना उन दिनों कि है जब हमारी शादी होकर घर आई और लोग हमे प्रजापति करने लगे। मैं तब से लाचार हुई जब हम अपनी पवित्रता को बरकरार रखती थी, किसी के यहाॅ खाना-पीना नही खाती थी और न ही किसी के यहाॅ का दिया गया कोई बनाया सामान खाती थी। इस कारण हमारे घर के पड़ोसी हमे डायन कहने लगे और तब से यह सिलसिला शुरू हुआ, सो अब तक चल रहा है। हद तो तब हो गई जब वर्ष 2009 के माघ महीने में जब हमारे भसूर कार्तिक दास का बेटा सरोज दास, जो 25 वर्ष का था। वो (तिलैया) कोडरमा रेलवे स्टेशन का रेलवे क्रासिंग पार कर रहा था और अचानक ट्रेन की चपेट में आने से उसकी मौत हो गई तो हमारे भसूर व गोतिया वालों ने ये आरोप लगाया कि यही मेरा बेटा को खा गई। इस कारण झगड़ा हो गया। झगड़े में वो सब हमे मारने तक उतारू हो गये। ग्रामीणों ने कहा कि इस बात को साबित किया जाय कि ये डायन है। इस बात को लेकर टनकुप्पा, गया जिला (बिहार) से भगत लाया गया। भगत ने मेरे गोतिया के घर में आॅटा, सिंदुर, रोरी से गोल चक्का बनाया। चक्के के बीच में एक चक्का जाॅत (जिससे गेहू/मकई दर्रा जाता है) रखा उस पर हमें बैठाकर सामने एक लोटा पानी रख दिया, पानी मंे आग लग गया। इस पर उसने कहा कि तुम डायन हो। यह कहकर मेरे पीठ पर एक झापड़ मारा और एक कबुतर काट कर दो बूॅद खून मेरे ऊपर गिरा दिया। इसके बाद मेरा आँचल जला दिया। इस काम को देखकर मेरी बेटी भगत पर गुस्सा की तो वो डाॅटा और भरी सभा-समाज के बीच मेरी बेटी को भी डायन कहकर प्रताड़ित किया और कई अपशब्द कहा, जो मैं नही कह सकती। भगत ने पुरे समाज के बीच यह भी कहा कि आप लोग कहिएगा तो हम इस औरत को जला देगें, लेकिन मेरे ऊपर केस नही होना चाहिए। तब हमारे गोतिया और खडे़ होकर देख रहे लोगों ने कुछ भी नही कहा। मेरी बेटी बोली अगर मेरी माॅ डायन है तो जला दो और इतना कहकर वो फुट-फुट कर रोने लगी। यह सब देखकर मैं भी रो पड़ी, मंै यह सोच रही थी कि मेरा एक ही 2 द्य च् ं ह म

बेटा है। भगवान मेरे बेटे को ठीक से रखना। मैं भी रो रही थी और मेरी बेटी भी, लेकिन वहाॅ खड़े सैकड़ो लोग में किसी ने कुछ नही कहा। यह देखकर मेरी आत्मा और रो पड़ी। मैं अंदर से टूट गई। मेरे अंदर उस समय जान नही रहा, लेकिन बेटे के ख्याल ने हमें हिम्मत दिया। इस बात को लेकर हम फैसला भी करवाये, कई राजनीति दल के लोगों से गुहार लगाई कि हमें कोई न्याय दिलवाये, हमारे उपर लगा कलंक कोई मिटाये, लेकिन हमारा कोई नही सुना। आज भी हमें डायन कहा जाता है। हमारे गाॅव में किसी को कुछ होता है तो पुरा गोतिया सब हमें डायन कहके गाली गलौज करने लगते है। तब मेरी आत्मा रो जाती है। मैं डायन नही हूॅ यह साबित करने के लिये हमारे गोतिया जो बोले हम सब किये फिर भी हमे डायन कहते है। मैं अपने घर के आस-पास पेड़-पौधा लगाता हूॅ तो वो भी उखाड़ कर फेक देते है। यह सोचकर मै परेशान रहती हूॅ। साथ ही मेरे बेटा का बेटा जो मेरा पोती है उसे किसी बच्चों के साथ खेलने नही दिया जाता है। रात में पास पड़ोस के लोग घर में पत्थर मारते है। इस तरह मैं परेशान हूॅ। आपको अपनी सारी घटना सुनाकर हल्का महसूस कर रही हूॅ आज तक किसी ने इस तरह हमारी घटना को नही सुना है।

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